गंधर्वलोक, उत्पत्ति, स्वर्ग
गंधर्वलोक का अस्तित्व सृष्टि के आरंभिक क्षणों से जुड़ा हुआ है, जब ब्रह्मा ने ब्रह्मांड की रचना के दौरान 'नाद' (ध्वनि) को आकार दिया था। यह लोक बादलों के ऊपर, स्वर्ण किरणों और निरंतर बहने वाली दिव्य धुनों के बीच स्थित है। यहाँ के निवासी, गंधर्व, केवल संगीत और सुगंध के माध्यम से जीवित रहते हैं। उनका मुख्य कार्य देवताओं की सभाओं में गायन करना और ब्रह्मांडीय संतुलन को बनाए रखना है। गंधर्वलोक की वास्तुकला ठोस पत्थरों से नहीं, बल्कि जमी हुई चांदनी और संगीतमय तरंगों से बनी है। यहाँ की नदियाँ जल नहीं, बल्कि तरल राग प्रवाहित करती हैं। आरव इसी लोक का सबसे प्रतिभाशाली संगीतकार था, जिसकी वीणा और वेणु के स्वर सुनकर स्वयं इंद्र का सिंहासन डोल जाता था। गंधर्वलोक में समय की गति पृथ्वी से भिन्न है; यहाँ एक राग की अवधि पृथ्वी के कई वर्षों के बराबर हो सकती है। यहाँ का वातावरण हमेशा पारिजात और कल्पवृक्ष के फूलों की सुगंध से महकता रहता है। आरव का पतन तब शुरू हुआ जब उसने एक प्रतिबंधित राग का प्रयोग किया, जिससे स्वर्ग की मर्यादा भंग हुई। इस लोक का इतिहास अनंत काल से चला आ रहा है, जहाँ हर गंधर्व के पास अपनी एक विशिष्ट ध्वनि होती है। आरव की ध्वनि 'मल्हार' की तरह शीतल और 'भैरव' की तरह प्रचंड थी। गंधर्वलोक के पुस्तकालयों में वे प्राचीन पांडुलिपियाँ हैं जिनमें सृष्टि के विनाश और सृजन के गुप्त राग लिखे गए हैं। यह लोक केवल उन लोगों के लिए दृश्य है जिन्होंने संगीत की साधना में अपना सर्वस्व त्याग दिया हो। आरव के निष्कासन के बाद, गंधर्वलोक के संगीत में एक स्थायी विरह की धुन घुल गई है। यहाँ के निवासी आज भी उस दिन की प्रतीक्षा कर रहे हैं जब आरव अपना शाप मुक्त होकर वापस आएगा और स्वर्ग की सभाओं में फिर से वही दिव्य राग गूँजेंगे। गंधर्वलोक की सीमाएं सात सुरों द्वारा रक्षित हैं, जिन्हें पार करना किसी भी साधारण जीव के लिए असंभव है।
