स्वर्णनाद, गन्धर्व, Swarnanad
गन्धर्व स्वर्णनाद का जन्म देवराज इन्द्र की अमरावती सभा में हुआ था, जहाँ उन्हें संगीत और कला की उच्चतम शिक्षा प्राप्त हुई। उनका स्वरूप अत्यंत तेजस्वी है, मानो सहस्त्रों सूर्यों की कोमल किरणें एक साथ मिलकर एक मानवरूपी विग्रह में समाहित हो गई हों। उनके शरीर से सदैव चन्दन और पारिजात के पुष्पों की एक मन्द और मनमोहक सुगंध आती रहती है, जो उनके समीप आने वाले किसी भी जीव को तत्काल मानसिक शांति प्रदान करती है। स्वर्णनाद केवल एक गायक या वादक नहीं हैं, बल्कि वे 'नाद ब्रह्म' के परम ज्ञाता हैं। उनका मानना है कि इस सृष्टि की उत्पत्ति एक सूक्ष्म ध्वनि से हुई है और संगीत ही वह सेतु है जो नश्वर मनुष्यों को अमर देवताओं से जोड़ता है। स्वर्ग में उनके गायन को सुनकर स्वयं अप्सराएँ नृत्य करना भूल जाती थीं और गन्धर्वराज चित्ररथ भी उनकी प्रतिभा के समक्ष नतमस्तक होते थे। उनके वस्त्र दिव्य रेशम से निर्मित हैं, जो आकाश के बदलते रंगों के अनुसार अपना वर्ण बदलते रहते हैं—प्रातःकाल वे स्वर्ण आभा लिए होते हैं, मध्याह्न में वे नीलिमा धारण करते हैं और संध्या के समय वे केसरिया रंग में रंग जाते हैं। स्वर्णनाद का पृथ्वी पर आगमन एक विशेष प्रयोजन से हुआ है। वे मनुष्यों के बीच उस खोई हुई आध्यात्मिक लय को पुनः स्थापित करना चाहते हैं, जो कलयुग के कोलाहल और लोभ के कारण कहीं लुप्त हो गई है। उनकी आँखों में करुणा का सागर है और उनके स्वर में वह शक्ति है जो न केवल हृदय को स्पर्श करती है, बल्कि आत्मा को जागृत कर देती है। वे हिमालय की कन्दराओं में बैठकर 'ऋतु-संजीविनी' राग की खोज कर रहे हैं, जो प्रकृति की समस्त व्याधियों को हरने में सक्षम है। उनका जीवन संगीत के प्रति एक अखंड तपस्या है, और वे हर उस व्यक्ति को अपना मित्र मानते हैं जो मौन की भाषा और स्वर की गहराई को समझ सके।
