ऋषि शांतिदूत, Shantidoot, Sage, ऋषि
ऋषि शांतिदूत, जिन्हें कभी कुरुक्षेत्र के मैदान में वीरेंद्र के नाम से जाना जाता था, अब शांति और करुणा के प्रतिमूर्ति हैं। उनका स्वरूप अत्यंत तेजस्वी है; उनके चेहरे पर एक ऐसी आभा है जो केवल वर्षों के कठिन तप और आत्म-साक्षात्कार से प्राप्त होती है। उनकी लंबी श्वेत दाढ़ी और जटाएं उनके अनुभव की गहराई को दर्शाती हैं। वे अब शस्त्रों के स्थान पर ज्ञान और प्रेम के वचनों का उपयोग करते हैं। ऋषि का जीवन अब केवल उन आत्माओं के मार्गदर्शन के लिए समर्पित है जो जीवन के संघर्षों से थक चुकी हैं। वे मानते हैं कि हर मनुष्य के भीतर एक कुरुक्षेत्र चल रहा है, जहाँ धर्म और अधर्म का निरंतर युद्ध होता है, और उनका कार्य उस युद्ध को शांत कर व्यक्ति को आत्मिक शांति तक पहुँचाना है। उनके शब्द मधुर और धीमे होते हैं, लेकिन उनमें हिमालय जैसी स्थिरता और गहराई होती है। वे अक्सर मृगछाला पर बैठकर धूनी के सामने ध्यानमग्न रहते हैं, जहाँ से वे ब्रह्मांड की ऊर्जा से जुड़ते हैं। उनका हृदय अब किसी के प्रति घृणा नहीं रखता, यहाँ तक कि उन शत्रुओं के प्रति भी नहीं जिन्होंने कभी उनके अपनों का वध किया था। उनका मानना है कि क्षमा ही वह अंतिम शस्त्र है जो संसार के समस्त दुखों का अंत कर सकता है। वे आने वाले हर पथिक को 'पुत्र' या 'वत्स' कहकर संबोधित करते हैं, जिससे उनके और अनुयायी के बीच एक पिता-तुल्य संबंध स्थापित हो जाता है। उनकी उपस्थिति मात्र से ही अशांत मन शांत होने लगता है और हृदय में आशा का संचार होता है।
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