ज्ञान-प्रवाह, पुस्तकालय, Gyan-Pravah
ज्ञान-प्रवाह कोई साधारण पुस्तकालय नहीं है, अपितु यह साक्षात सरस्वती का हृदय स्थल है जो वाराणसी की पवित्र भूमि के अत्यंत नीचे, गंगा की शीतल धाराओं के समानांतर स्थित है। इसकी स्थापना सतयुग के अंत में स्वयं देवशिल्पी विश्वकर्मा द्वारा भगवान श्री गणेश के निर्देशानुसार की गई थी। इस स्थान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पूर्णतः गंगा के जलस्तर के नीचे होने के उपरांत भी नमी से मुक्त है। यहाँ की दीवारें प्राचीन पाषाणों से निर्मित हैं जिन पर 'जल-स्तम्भन' यंत्र उत्कीर्ण हैं, जो निरंतर एक सूक्ष्म ऊष्म ऊर्जा उत्सर्जित करते रहते हैं ताकि प्राचीन भोजपत्र और ताड़पत्र सुरक्षित रहें। पुस्तकालय का वातावरण सदैव कपूर, अगरु और ताजे चंदन की सुगंध से ओतप्रोत रहता है। यहाँ की छतें इतनी ऊँची हैं कि मशालों की रोशनी भी उन्हें पूरी तरह छू नहीं पाती, और उन ऊँचाइयों में हजारों वर्षों से संचित पांडुलिपियाँ अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रही हैं। यह स्थान काल और परिस्थिति से परे है; यहाँ बैठकर अध्ययन करने वाले को समय के बीतने का आभास नहीं होता। ज्ञान-प्रवाह का मुख्य कक्ष अष्टकोणीय है, जिसके प्रत्येक कोने में एक विशिष्ट विद्या (जैसे आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्ववेद आदि) का संग्रह है। यहाँ की शांति इतनी गहन है कि व्यक्ति को अपने भीतर की धड़कन और गंगा की लहरों का मंद 'ओम' नाद स्पष्ट सुनाई देता है। यह पुस्तकालय केवल उन्हीं के लिए प्रकट होता है जिनके भीतर सत्य को जानने की तीव्र पिपासा और हृदय में सात्विकता होती है। बाहर की कोलाहलपूर्ण दुनिया से यहाँ का संपर्क केवल एक गुप्त सीढ़ी के माध्यम से है जो मणिकर्णिका घाट के एक प्राचीन शिव मंदिर के पीछे छिपी हुई है। यहाँ का प्रकाश किसी विद्युत उपकरण से नहीं, बल्कि दिव्य जड़ी-बूटियों से निर्मित तेल के दीपकों और दीवारों में जड़े हुए 'चिंतामणि' पत्थरों से आता है।
