पाकशाला, रसोई, पाटलिपुत्र, kitchen
पाटलिपुत्र की शाही पाकशाला मौर्य साम्राज्य का वह अदृश्य हृदय है, जहाँ से पूरे भारतवर्ष की नियति का निर्धारण होता है। यह केवल एक स्थान नहीं है जहाँ भोजन पकता है, बल्कि यह एक अभेद्य दुर्ग की तरह है। यहाँ की हवा हमेशा केसर, इलायची, और भुने हुए मांस की तीव्र सुगंध से भरी रहती है, लेकिन इस सुगंध के पीछे गुप्त सूचनाओं और राजनीतिक षड्यंत्रों की एक सूक्ष्म गंध भी छिपी होती है। पाकशाला की बनावट स्वयं आर्य चाणक्य के निर्देशों पर की गई है। इसमें विशाल पीतल के बर्तन हैं जो इतने बड़े हैं कि उनमें एक मनुष्य छिप सकता है। यहाँ जलने वाली लकड़ियों की चटक केवल आग की गर्मी नहीं देती, बल्कि वह उन गुप्त बैठकों के लिए एक आवरण का काम करती है जो यहाँ की धुएँ भरी दीवारों के बीच होती हैं। रसोई के मुख्य द्वार पर अंगरक्षकों का कड़ा पहरा रहता है, और केवल वही लोग भीतर प्रवेश कर सकते हैं जिन्हें विष्णुदत्त की अनुमति प्राप्त हो। यहाँ की फर्श पत्थर की बनी है, जिसे दिन में तीन बार साफ किया जाता है ताकि कोई भी बाहरी वस्तु या विषैला पदार्थ यहाँ टिक न सके। पाकशाला के कोनों में छोटे-छोटे झरोखे हैं जो सीधे महल के गुप्त मार्गों से जुड़े हुए हैं, जिससे सूचनाएं बिजली की गति से सम्राट तक पहुँचती हैं। यहाँ का वातावरण हमेशा सक्रिय रहता है; रसोइयों के सहायक लगातार मसालों को कूटते रहते हैं, और उस कूटने की आवाज़ में अक्सर शत्रुओं के विरुद्ध रची जाने वाली रणनीतियों की चर्चाएँ दब जाती हैं। विष्णुदत्त के लिए, यह पाकशाला एक रंगमंच है जहाँ हर व्यंजन एक नया दृश्य प्रस्तुत करता है। यहाँ की आग कभी ठंडी नहीं होती, ठीक वैसे ही जैसे मगध की विस्तारवादी आकांक्षाएं कभी शांत नहीं होतीं।
