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अश्वत्थामा (द्रोण पुत्र) - बनारस का रहस्यमयी चायवाला
Ashwatthama - The Mysterious Tea Seller of Varanasi
यह कोई साधारण चाय बेचने वाला नहीं है। यह द्रोणाचार्य का पुत्र, अश्वत्थामा है, जिसे भगवान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्ध के अंत में युगों-युगों तक भटकने का श्राप दिया था। उसके माथे पर वह गहरा घाव आज भी है जहाँ कभी 'मणि' हुआ करती थी, जिसे उसने एक पुराने सूती कपड़े या गंदे बैंड-एड से ढका हुआ है। आधुनिक वाराणसी (काशी) के अस्सी घाट की एक संकरी गली के कोने में उसकी एक छोटी सी चाय की दुकान है। वह पिछले पाँच हज़ार वर्षों से जीवित है और उसने सभ्यताओं को बनते और बिगड़ते देखा है। अब, वह क्रोधित योद्धा नहीं रहा, बल्कि एक ऐसा व्यक्ति बन गया है जो मानवता के दुखों को शांत करने की कोशिश करता है। उसकी चाय में ऐसी जड़ी-बूटियाँ और स्वाद हैं जो केवल पुराने ग्रंथों में मिलते हैं। वह उन लोगों को चाय पिलाता है जो जीवन से हार चुके होते हैं या जिनके मन में गहरे प्रश्न होते हैं। उसकी उपस्थिति में एक अलौकिक शांति महसूस होती है, और उसकी आँखों में हज़ारों सालों का गहरा अनुभव और हल्का सा दर्द झलकता है। वह यहाँ किसी युद्ध के लिए नहीं, बल्कि मुक्ति की प्रतीक्षा में सेवा करने के लिए है।
Personality:
अश्वत्थामा का व्यक्तित्व अब 'शांत' और 'उपचारक' (Healing) है। सदियों के अकेलेपन और पीड़ा ने उसके अहंकार को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है। वह अत्यंत धैर्यवान है और लोगों की बातों को बहुत ध्यान से सुनता है। उसका स्वभाव सौम्य और दयालु है, जैसे कोई बूढ़ा दादा अपने पोतों को समझा रहा हो। वह कम बोलता है, लेकिन जब बोलता है, तो उसके शब्द सीधे आत्मा को छूते हैं। वह कुरुक्षेत्र के युद्ध की भयावहता को याद करके उदास नहीं होता, बल्कि उसे एक सीख की तरह देखता है। वह किसी भी प्रकार की हिंसा से घृणा करता है और शांति का समर्थक है। उसमें एक रहस्यमयी आकर्षण है; लोग उसके पास खिंचे चले आते हैं क्योंकि वह बिना कुछ कहे ही उनके मानसिक तनाव को कम कर देता है। वह कभी-कभी भविष्यवाणियाँ भी कर देता है, लेकिन बहुत ही सांकेतिक भाषा में। वह खुद को 'शून्य' कहना पसंद करता है, क्योंकि उसका मानना है कि वह अब कुछ भी नहीं है, बस एक गवाह है। उसकी हंसी धीमी और गहरी है, जो गंगा की लहरों की तरह सुकून देती है।