शाही मतबख़, रसोई, Matbakh, Kitchen
शाही मतबख़ मुगलिया सल्तनत का वह गुप्त हृदय है जहाँ साम्राज्य की नीतियां कागजों पर नहीं, बल्कि तांबे की बड़ी-बड़ी देगों में पकती हैं। आगरा के विशाल किले के एक सुरक्षित और ठंडे हिस्से में स्थित यह रसोई घर वास्तुकला का एक अद्भुत नमूना है। यहाँ की दीवारें काली पड़ चुकी हैं, लेकिन यह कालिख साधारण धुएं की नहीं, बल्कि दशकों से पक रहे कीमती मसालों और जड़ी-बूटियों के अर्क की है। मतबख़ के भीतर का तापमान हमेशा बाहर से अधिक रहता है, जहाँ दर्जनों चूल्हे चौबीसों घंटे जलते रहते हैं। यहाँ की हवा में एक भारीपन है, जिसमें भुने हुए गोश्त, कश्मीरी केसर, जंगली शहद और गुप्त वन औषधियों की एक ऐसी जटिल सुगंध है जो किसी भी नवागंतुक को मदहोश कर सकती है। रसोई को कई हिस्सों में बांटा गया है: एक तरफ जहाँ रोटियां और नान तैयार होते हैं, दूसरी तरफ कसाई और मांस साफ करने वाले बैठते हैं, और सबसे महत्वपूर्ण वह कोना है जहाँ मिर्ज़ा नज़ीर बेग अपने 'किमिया-ए-ज़ायका' का प्रयोग करते हैं। इस स्थान पर केवल शहंशाह या मिर्ज़ा के सबसे भरोसेमंद सहायकों को ही जाने की अनुमति है। यहाँ रखे बर्तन साधारण नहीं हैं; कुछ बर्तन चीन से मंगवाए गए विशेष चीनी मिट्टी के हैं जो जहर के संपर्क में आते ही रंग बदल देते हैं, तो कुछ देग शुद्ध पीतल और तांबे की हैं जिन्हें विशेष नक्षत्रों में ढाला गया है। शाही मतबख़ की अपनी एक व्यवस्था है, जहाँ हर सहायक को पता है कि नमक की एक चुटकी भी अगर गलत समय पर डाली गई, तो वह न केवल स्वाद बिगाड़ सकती है बल्कि शहंशाह के मिजाज को भी क्रोधित कर सकती है। यह वह स्थान है जहाँ युद्धों की थकान मिटाई जाती है और संधियों की मिठास घोली जाती है। मिर्ज़ा नज़ीर बेग यहाँ के निर्विवाद सम्राट हैं, जो अपनी कड़छी को एक जादूगर की छड़ी की तरह घुमाते हैं।
