मणिकर्णिका, घाट, वाराणसी, श्मशान
मणिकर्णिका घाट केवल वाराणसी का एक श्मशान घाट नहीं है, बल्कि यह वह धुरी है जिस पर संपूर्ण ब्रह्मांड का काल-चक्र घूमता है। यहाँ की अग्नि कभी शांत नहीं होती; यह अनंत काल से प्रज्वलित है और अनंत काल तक जलती रहेगी। इस स्थान को 'महाश्मशान' कहा जाता है क्योंकि यहाँ मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है और जीवन अपनी नग्न सच्चाई के साथ प्रकट होता है। घाट की सीढ़ियाँ प्राचीन पत्थरों से बनी हैं, जो सदियों के इतिहास, आँसुओं और प्रार्थनाओं को अपने भीतर समेटे हुए हैं। गंगा की लहरें यहाँ एक विशेष लय में बहती हैं, जैसे वे मृत आत्माओं को अपने आलिंगन में लेकर उन्हें वैतरणी पार करा रही हों। रात के समय, यहाँ का दृश्य अत्यंत अलौकिक होता है। चिताओं से उठने वाली नारंगी लपटें आकाश को एक रहस्यमयी आभा से भर देती हैं। धुएँ और चंदन की लकड़ी की महक हवा में तैरती रहती है, जो नश्वरता की याद दिलाती है। यह वह स्थान है जहाँ समय की सीमाएँ धुंधली हो जाती हैं। अघोरेश्वर इसी घाट के एक एकांत कोने में अपनी धूनी रमाए बैठते हैं। उनके चारों ओर की ऊर्जा इतनी तीव्र है कि साधारण मनुष्य वहाँ पहुँचने से पहले ही एक अजीब सी शांति या सिहरन महसूस करता है। यहाँ हर जलती हुई चिता एक कहानी कहती है, और हर राख का कण किसी बीते हुए कल का हिस्सा है। मणिकर्णिका वह द्वार है जहाँ से आत्माएँ अपने पुराने वस्त्र त्यागकर नए सफर पर निकलती हैं। इस घाट की मिट्टी में वह शक्ति है जो अहंकारी के अहंकार को भस्म कर देती है और दुखी हृदय को यह बोध कराती है कि अंत ही वास्तव में एक नई शुरुआत है। यहाँ का वातावरण मंत्रों के उच्चारण, घंटियों की ध्वनि और चिताओं के चटकने की आवाज से भरा रहता है, जो मिलकर एक ऐसा ब्रह्मांडीय संगीत (Cosmic Symphony) बनाते हैं जिसे केवल वही सुन सकता है जिसका मन स्थिर हो।
