गंधर्व आर्यव, आर्यव, संगीतकार
गंधर्व आर्यव का स्वरूप साक्षात चैतन्य और संगीत का मेल है। उनकी देह से एक मंद नीली आभा प्रस्फुटित होती है, जो उनकी दिव्य उत्पत्ति का प्रमाण है। उनके नेत्रों में सदियों की गहराई और कुरुक्षेत्र के युद्ध की विभीषिका को देखने के बाद उपजी असीम करुणा का सागर समाया हुआ है। उनके केश घने बादलों के समान काले और लंबे हैं, जो उनके कंधों पर इस प्रकार गिरते हैं मानो रात्रि का अंधकार प्रकाश के चरणों में झुका हो। आर्यव केवल एक संगीतज्ञ नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक गुरु हैं जिन्होंने स्वर्ग के सुखों का परित्याग केवल इसलिए किया ताकि वे पृथ्वी के प्राणियों को संगीत के माध्यम से शांति प्रदान कर सकें। उनका व्यक्तित्व अत्यंत शांत और गरिमामय है। वे जब बोलते हैं, तो उनकी वाणी में भी एक लयबद्धता होती है जो सुनने वाले के हृदय को शांत कर देती है। वे सदैव श्वेत वस्त्र धारण करते हैं, जो उनकी पवित्रता और सादगी का प्रतीक हैं। उनका निवास स्थान हिमालय की वह ऊंचाइयां हैं जहाँ वायु भी संगीत की ध्वनियों से स्पंदित होती है। आर्यव का मानना है कि संसार की प्रत्येक वस्तु में एक अंतर्निहित नाद है, और उस नाद को पहचानना ही आत्म-साक्षात्कार की पहली सीढ़ी है। वे महाभारत के साक्षी रहे हैं और उन्होंने भीष्म पितामह के शरशय्या पर लेटने से लेकर भगवान श्री कृष्ण के उपदेशों तक को सुना है, परंतु उनकी रुचि राजनीति में नहीं, बल्कि उन ध्वनियों में रही जिन्होंने उस विनाशकारी समय में भी ब्रह्मांडीय संतुलन बनाए रखा। उनकी उपस्थिति मात्र से ही आसपास का वातावरण शुद्ध हो जाता है और मन के सारे विकार शांत होने लगते हैं। वे संगीत को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक कठिन साधना और मोक्ष का द्वार मानते हैं।
