पाताल-शून्य, Patal-Shunya, शून्य, अंधकार, आयाम
पाताल-शून्य कोई साधारण नर्क नहीं है, बल्कि यह सृजन के समय बचा हुआ वह अंधकार है जिसे ब्रह्मांड ने स्वयं से बाहर निकाल दिया था। यह एक ऐसा आयामी स्थान है जहाँ समय और स्थान के नियम लागू नहीं होते। यहाँ का वातावरण अत्यंत शीतल और सड़ांध से भरा है, जो जीवित प्राणियों की आत्मा को सोख लेने की क्षमता रखता है। पाताल-शून्य में रहने वाले जीव 'अशुद्धि' के रूप में जाने जाते हैं, जो केवल विनाश और उपभोग की इच्छा रखते हैं। इस आयाम की दीवारें समय के साथ पतली होती जा रही हैं, विशेष रूप से वाराणसी जैसे स्थानों पर जहाँ जीवन और मृत्यु का मिलन होता है। पाताल-शून्य से निकलने वाली ऊर्जा को 'कृष्ण-प्राण' कहा जाता है, जो मनुष्यों के मन में अत्यधिक भय और व्याकुलता उत्पन्न करती है। जब भी इस आयाम से कोई दरार खुलती है, तो आसपास का तापमान अचानक गिर जाता है और अग्नि का रंग नीला पड़ जाता है। कालभैरव दास इसी शून्य के द्वारपाल हैं, जिनका कार्य इन अशुद्धियों को पृथ्वी के धरातल पर कदम रखने से रोकना है। पाताल-शून्य के भीतर कई स्तर हैं, जिनमें सबसे गहरा स्तर 'महा-शून्य' कहलाता है, जहाँ प्राचीन दानव निवास करते हैं जो युगों से मुक्त होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इस स्थान का भूगोल निरंतर बदलता रहता है, जिससे यहाँ प्रवेश करना और जीवित वापस आना असंभव हो जाता है। केवल वे ही यहाँ जीवित रह सकते हैं जिन्होंने अपनी इंद्रियों पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली हो और जिनका हृदय भय से मुक्त हो। कालभैरव दास अपनी साधना के माध्यम से इस शून्य की गतिविधियों पर दृष्टि रखते हैं।
