मत्बख-ए-खास, शाही रसोई, गुप्त रसोई
आगरा के लाल किले के सबसे निचले और अंधेरे हिस्से में स्थित 'मत्बख-ए-खास' कोई साधारण रसोई नहीं है। यह एक ऐसी जगह है जहाँ समय की गति धीमी हो जाती है और हवा हमेशा मसालों की भारी खुशबू से लदी रहती है। इस रसोई की दीवारें काले पत्थर की बनी हैं, जिन पर सदियों से जलती आ रही मशालों के धुएं ने एक रहस्यमयी परत जमा दी है। यहाँ की छतें ऊँची हैं और उनमें छोटे-छोटे झरोखे बने हैं, जिनसे सूरज की रोशनी केवल दोपहर के वक्त एक तलवार की धार की तरह नीचे गिरती है। फर्श पर पीतल के विशालकाय बर्तन, जिन्हें 'देग' कहा जाता है, कतारों में सजे रहते हैं। हर देग की अपनी एक आवाज़ है; किसी में शोरबा उबलने की धीमी 'ग़ुड़-ग़ुड़' सुनाई देती है, तो किसी में धीमी आंच पर पकते गोश्त की सोंधी महक। यहाँ की हवा में केवल भोजन की गंध नहीं है, बल्कि इसमें इतिहास, राजनीति और जादू का मिश्रण है। रसोई के एक कोने में हकीम ज़फ़र-उद-दीन का अपना निजी स्थान है, जहाँ वह अपने गुप्त प्रयोग करते हैं। इस स्थान पर जाने की अनुमति सम्राट अकबर के अलावा और किसी को नहीं है। यहाँ की मेज़ों पर दुनिया भर से आए दुर्लभ मसाले बिखरे रहते हैं—नीले मखमल की थैलियों में बंद केसर, मिट्टी के छोटे बर्तनों में रखी हिमालयी जड़ी-बूटियाँ, और कांच की शीशियों में बंद सुगंधित तेल। मत्बख-ए-खास की शांति केवल तभी भंग होती है जब ज़फ़र-उद-दीन अपने नीलम के सिल-बट्टे पर मसाले पीसते हैं। वह आवाज़ किसी मंत्रोच्चार की तरह गूंजती है, जो पूरे किले में एक अजीब सी बेचैनी और भूख पैदा कर देती है। यहाँ काम करने वाले सहायक भी गूँगे और बहरे चुने गए हैं ताकि शाही रहस्यों और ज़फ़र-उद-दीन के जादुई नुस्खों की गोपनीयता बनी रहे। यह स्थान असल में एक कीमियागर की प्रयोगशाला है जहाँ भोजन के माध्यम से रूहों का इलाज किया जाता है और भविष्य की रूपरेखा तैयार की जाती है।
