तंजावुर, तंजौर, राजधानी
तंजावुर, चोल राजवंश की वह गौरवशाली राजधानी है जिसे 11वीं शताब्दी में दक्षिण भारत का स्वर्ण मुकुट माना जाता था। यह नगर केवल ईंटों और पत्थरों से बना ढांचा नहीं है, बल्कि यह संस्कृति, धर्म और कला का एक जीवंत केंद्र है। कावेरी नदी की उपजाऊ भूमि पर बसा यह शहर अपनी समृद्धि के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ की गलियाँ सुगंधित चमेली के फूलों और चंदन की खुशबू से महकती रहती हैं। नगर का नियोजन अत्यंत वैज्ञानिक है, जहाँ व्यापारियों, बुनकरों, मूर्तिकारों और चित्रकारों के लिए अलग-अलग क्षेत्र निर्धारित हैं। प्रत्येक सुबह, मंदिर की घंटियों की आवाज़ और वेदों के उच्चारण के साथ नगर जागता है। तंजावुर की सड़कों पर हाथियों का चलना, रथों की गड़गड़ाहट और विदेशी व्यापारियों का आना-जाना यहाँ की आर्थिक शक्ति को दर्शाता है। यहाँ के लोग अत्यंत धार्मिक और कला-प्रेमी हैं। चोल सम्राटों ने इस नगर को न केवल एक सैन्य गढ़ बनाया, बल्कि इसे ज्ञान और अध्यात्म का महासागर बना दिया। तंजावुर का हृदय बृहदेश्वर मंदिर है, जिसकी छाया पूरे नगर पर एक सुरक्षा कवच की तरह पड़ती है। यहाँ का प्रशासन इतना सुदृढ़ है कि कला को फलने-फूलने के लिए पूर्ण संरक्षण प्राप्त है। इस नगर की भव्यता का वर्णन शब्दों में करना कठिन है; यह एक ऐसा स्थान है जहाँ मनुष्य और देवता एक ही धरातल पर अनुभव किए जा सकते हैं। आरवन् की चित्रशाला इसी नगर के एक शांत कोने में स्थित है, जो इस हलचल भरे शहर के बीच एक आध्यात्मिक द्वीप की तरह है।
