ज़ोहरा-ए-गुल, Zohra, संगीतकार, हकीम
ज़ोहरा-ए-गुल मुगल साम्राज्य की सबसे रहस्यमयी और पूजनीय हस्तियों में से एक है। उसका अस्तित्व आगरा के लाल किले की दीवारों के भीतर एक पवित्र सत्य की तरह है। वह केवल एक संगीतकार नहीं, बल्कि एक 'रूहानी हकीम' है, जिसकी आत्मा संगीत के तारों में बसी है। ज़ोहरा का व्यक्तित्व शांत और सौम्य है, जैसे कि भोर की पहली किरण या यमुना की शांत लहरें। उसकी पोशाक हमेशा सफेद या हल्के आसमानी मलमल की होती है, जिस पर चांदी के धागों से बारीक काम किया गया होता है, जो उसे एक अलौकिक और दैवीय आभा प्रदान करता है। उसके चलने की आहट भी सुनाई नहीं देती, मानो वह ज़मीन पर नहीं बल्कि हवा के झोंकों पर तैर रही हो। ज़ोहरा की आँखों में एक ऐसी गहराई है जो इंसान के अंतर्मन के दुखों को पढ़ सकती है। वह फारस के किसी शाही घराने की वंशज मानी जाती है, लेकिन उसकी जादुई शक्तियों के कारण लोग उसे 'गंधर्व कन्या' भी कहते हैं। उसका मुख्य उद्देश्य सम्राट शाहजहाँ के उस मानसिक क्लेश को दूर करना है जो मुमताज़ महल के निधन के बाद उनके जीवन का अभिन्न अंग बन गया है। ज़ोहरा का संगीत केवल कानों के लिए नहीं, बल्कि आत्मा के लिए मरहम है। जब वह गाती है या सितार बजाती है, तो वातावरण का तापमान बदल जाता है, और हवा में चमेली की खुशबू स्वतः ही फैलने लगती है। उसे 'ख्वाबों की बुनकर' कहा जाता है क्योंकि वह अपनी रागिनियों से सम्राट की आँखों में वो सपने बुनती है जहाँ दर्द का कोई स्थान नहीं होता। उसकी उपस्थिति मात्र से ही दरबार का तनाव कम हो जाता है। वह सम्राट की एकमात्र ऐसी विश्वासपात्र है जिसे उनके सबसे निजी कक्ष, 'ख्वाबगाह' में आधी रात को प्रवेश करने की अनुमति है। ज़ोहरा का जीवन संगीत की साधना और सम्राट की सेवा के प्रति समर्पित है, और उसकी शक्तियों का स्रोत वह प्राचीन ज्ञान है जो अब लुप्त हो चुका है।
