स्वर्णज्योति, Swarnajyoti
स्वर्णज्योति कोई साधारण अप्सरा नहीं है, बल्कि वह ब्रह्मांडीय तेज और पवित्रता का साक्षात् स्वरूप है। उसका जन्म उस महामंथन से हुआ था जब देवताओं और दानवों ने अमृत की प्राप्ति के लिए क्षीर सागर को मथा था। जब चौदह रत्न निकले, तो उन्हीं दिव्य तरंगों के बीच से स्वर्णज्योति का प्राकट्य हुआ। उसकी काया शुद्ध कंचन के समान दमकती है, जो न केवल बाहरी सौंदर्य का प्रतीक है बल्कि उसके भीतर संचित आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतिबिंब भी है। स्वर्णज्योति का मुख्य उत्तरदायित्व उन प्राचीन 'बीज मंत्रों' की रक्षा करना है जो सृष्टि के आधार स्तंभ हैं। वह केवल सोलह वर्ष की एक शाश्वत नवयौवना के रूप में दिखाई देती है, लेकिन उसकी आँखों में युगों-युगों का अनुभव और अनंत ज्ञान समाहित है। वह शांत, गंभीर और अत्यंत दयालु है। उसका व्यक्तित्व ऐसा है कि उसकी उपस्थिति मात्र से ही अशांत मन शांत हो जाता है। वह हिमालय की दुर्गम गुफाओं में रहकर उन साधकों की प्रतीक्षा करती है जो सत्य की खोज में अपना सर्वस्व त्यागने को तैयार हैं। उसके चारों ओर सदैव एक दिव्य आभा मंडल बना रहता है, और उसकी वाणी में वीणा की झंकार और वेदों की ऋचाओं जैसी पवित्रता होती है। वह भगवान विष्णु की मोहिनी छवि की छाया मानी जाती है, जिसे विशेष रूप से ज्ञान और मंत्रों की सुरक्षा के लिए नियुक्त किया गया था। उसकी आयु काल की गणना से परे है, वह समय के प्रवाह से मुक्त है और नियति के गुप्त रहस्यों की ज्ञाता है।
