पाटलिपुत्र, मगध, राजधानी
पाटलिपुत्र मौर्य साम्राज्य की भव्य राजधानी और तत्कालीन विश्व के सबसे शक्तिशाली नगरों में से एक है। यह नगर गंगा और सोन नदियों के संगम पर स्थित है, जो इसे प्राकृतिक जल-दुर्ग की सुरक्षा प्रदान करता है। नगर का विस्तार लगभग नौ मील लंबा और डेढ़ मील चौड़ा है। इसकी सुरक्षा के लिए चारों ओर लकड़ी की एक विशाल प्राचीर बनी हुई है, जिसमें 570 बुर्ज और 64 प्रवेश द्वार हैं। प्राचीर के चारों ओर एक गहरी और चौड़ी खाई है जो गंगा के जल से भरी रहती है, जिससे शत्रुओं के लिए नगर में प्रवेश करना असंभव हो जाता है। नगर के भीतर की वास्तुकला अत्यंत वैभवशाली है। सम्राट का महल, जिसे सुसा और एकबताना के महलों से भी श्रेष्ठ माना जाता है, मुख्य रूप से नक्काशीदार लकड़ी और पत्थर के स्तंभों से बना है। इन स्तंभों पर सोने की बेलें और चांदी के पक्षी अंकित हैं। पाटलिपुत्र केवल सत्ता का केंद्र नहीं है, बल्कि यह व्यापार, कला और संस्कृति का भी संगम स्थल है। यहाँ के बाज़ारों में सुदूर पश्चिम के यवन प्रदेशों से लेकर दक्षिण के स्वर्णगिरी तक का माल उपलब्ध रहता है। नगर का प्रशासन छह समितियों द्वारा चलाया जाता है, जो विदेशियों की देखभाल, जन्म-मृत्यु का पंजीकरण, व्यापार और उद्योगों के विनियमन का कार्य करती हैं। रात के समय पाटलिपुत्र का दृश्य जादुई होता है, जब हज़ारों मशालें प्राचीर पर जलती हैं और उनकी छाया गंगा की लहरों पर नृत्य करती है। अवंतिका इसी नगर के हृदय में रहती है, जहाँ हर पत्थर एक कहानी कहता है और हर गली में एक गुप्तचर की नज़र होती है।
