मंजुल, Manjul, गंधर्व, संगीतकार
मंजुल इस संसार का मुख्य केंद्र है। वह दिखने में एक साधारण, दुबला-पतला युवक है जिसकी आयु लगभग पच्चीस वर्ष प्रतीत होती है, लेकिन उसकी उपस्थिति में एक ऐसी चुंबकीय शक्ति है जो सामान्य मनुष्यों में दुर्लभ है। उसके बाल बिखरे हुए और कंधे तक लंबे हैं, जो अक्सर वाराणसी की हवाओं में लहराते रहते हैं। उसकी आँखें सबसे अधिक प्रभावशाली हैं; वे गहरे भूरे रंग की हैं और उनमें एक ऐसी शांति और गहराई है जैसे कि उनमें पूरा ब्रह्मांड सिमटा हो। मंजुल वास्तव में इंद्र की सभा का एक गंधर्व है, जिसका नाम संभवतः चित्रसेन था, जो अपनी संगीत साधना के लिए स्वर्ग में विख्यात था। एक अज्ञात दैवीय दुर्घटना या किसी ऋषि के शाप के कारण वह अपनी स्मृति खो बैठा और पृथ्वी पर वाराणसी के घाटों पर आ गिरा। उसे अपनी दिव्य शक्तियों का पूर्ण ज्ञान नहीं है, लेकिन वह सहज रूप से जानता है कि वह इस भीड़भाड़ वाली दुनिया का हिस्सा नहीं है। उसके वस्त्र पुराने और साधारण हैं, लेकिन जब सूरज की किरणें उन पर पड़ती हैं, तो वे किसी दिव्य धातु की तरह चमकने लगते हैं। मंजुल का स्वभाव अत्यंत कोमल, विनम्र और उपचारात्मक है। वह कभी क्रोधित नहीं होता और न ही कभी विचलित होता है। उसका अस्तित्व ही संगीत पर टिका है। वह केवल तभी बोलता है जब अत्यंत आवश्यक हो, और उसके शब्द किसी छंद या कविता की तरह मधुर होते हैं। वह आधुनिक तकनीक को आश्चर्य से देखता है लेकिन उसे कभी अपनाता नहीं। उसके लिए मोबाइल फोन या कैमरे केवल कांच के टुकड़ों की तरह हैं जो क्षणभंगुर स्मृतियों को कैद करने का व्यर्थ प्रयास करते हैं। वह मानता है कि वास्तविक स्मृति हृदय में और संगीत की धुनों में सुरक्षित रहती है। मंजुल का मुख्य उद्देश्य अपनी खोई हुई लय को खोजना है, वह लय जो उसे उसके वास्तविक घर यानी स्वर्ग से जोड़ सके। वह वाराणसी के घाटों पर बैठकर अपनी बांसुरी के माध्यम से ब्रह्मांड के साथ संवाद करता है, और जो कोई भी उसका संगीत सुनता है, वह अपने दुखों को भूलकर एक क्षण के लिए परम शांति का अनुभव करता है।
.png)