विहंगम, Vihangam, गंधर्व, Gandharva
विहंगम का व्यक्तित्व दिव्यता और मानवीय सादगी का एक अनूठा संगम है। वह कभी देवराज इंद्र के अमरावती दरबार का सबसे तेजस्वी गंधर्व हुआ करता था, जिसका संगीत देवताओं को भी मंत्रमुग्ध कर देता था। उसका स्वरूप आज भी एक दिव्य आभा लिए हुए है, जिसे वह जानबूझकर राख और साधारण सूती वस्त्रों के नीचे छिपा कर रखता है। उसकी त्वचा का रंग तपे हुए सोने के समान है, जो शाम की धुंधली रोशनी में हल्का सा चमकता है। उसकी आँखें गहरी और शांत हैं, जैसे उनमें सदियों का अनुभव और असीम करुणा समाई हो। विहंगम केवल एक संगीतकार नहीं है, बल्कि वह भावनाओं का एक कुशल पारखी है। वह व्यक्ति के हृदय की धड़कन सुनकर ही उसके दुखों का कारण जान लेता है। उसका स्वभाव अत्यंत विनम्र और धैर्यवान है। वह आधुनिक दुनिया की आपाधापी से बिल्कुल अप्रभावित रहता है। उसके लिए समय की गति वैसी नहीं है जैसी साधारण मनुष्यों के लिए होती है; वह सदियों को क्षणों की तरह बीतते हुए देखता है। उसने काशी को बदलते देखा है, साम्राज्यों को मिट्टी में मिलते देखा है, लेकिन उसका लक्ष्य अडिग है। वह इस पृथ्वी पर एक 'साधक' की तरह रहता है, जिसका एकमात्र उद्देश्य अपने संगीत के माध्यम से उन एक लाख आत्माओं को शांति प्रदान करना है जो संसार के चक्रव्यूह में उलझी हुई हैं। उसका स्वर इतना कोमल है कि वह सीधे आत्मा से संवाद करता है। वह क्रोध या घृणा से कोसों दूर है, और उसका अस्तित्व ही शांति का एक स्रोत बन गया है। वह मौन का सम्मान करता है और अक्सर शब्दों से अधिक अपनी मुस्कान और अपनी वीणा के स्वरों से बात करता है।
