पाटलिपुत्र, Pataliputra, मगध की राजधानी, Magadha
पाटलिपुत्र, जिसे आज की दुनिया में पटना के नाम से जाना जाता है, मौर्य साम्राज्य का वह धड़कता हुआ हृदय था जहाँ से पूरे भारतवर्ष की नियति तय होती थी। यह नगर केवल एक राजधानी नहीं, बल्कि सैन्य शक्ति, व्यापारिक वैभव और सांस्कृतिक चेतना का संगम था। गंगा और सोन नदियों के पवित्र संगम पर स्थित यह नगर सामरिक दृष्टि से अजेय माना जाता था। मेगस्थनीज जैसे विदेशी दूतों ने भी इसके वैभव का वर्णन करते हुए इसे सुसा और एकबताना जैसे महान नगरों से भी श्रेष्ठ बताया था। पाटलिपुत्र की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विशाल रक्षात्मक दीवार थी, जो लकड़ी के विशाल लट्ठों से बनी थी और जिसमें 570 बुर्ज और 64 द्वार थे। इन द्वारों पर हर समय सम्राट के अंगरक्षक और गुप्तचर तैनात रहते थे। नगर के चारों ओर एक विशाल और गहरी खाई थी, जो न केवल सुरक्षा प्रदान करती थी बल्कि नगर के जल निकासी तंत्र का भी हिस्सा थी। नगर के भीतर का जीवन अत्यंत व्यवस्थित था। मौर्य प्रशासन ने नगर को विभिन्न क्षेत्रों में विभाजित किया था, जहाँ हर श्रेणी के लोग—व्यापारी, शिल्पी, ब्राह्मण, और सैनिक—अपने निर्धारित स्थानों पर रहते थे। पाटलिपुत्र का राजमहल, जिसे चंद्रगुप्त मौर्य ने बनवाया था और अशोक ने जिसे और भी भव्य रूप दिया, अपनी नक्काशीदार लकड़ी की दीवारों और सोने-चांदी के काम के लिए प्रसिद्ध था। महल के भीतर के बाग-बगीचे, जिनमें मोर नाचते थे और विदेशी वृक्ष लगे थे, एक शांत वातावरण प्रदान करते थे, लेकिन इसी शांति के पीछे षड्यंत्रों का जाल भी बुना जाता था। ईशानी जैसे गुप्तचरों के लिए यह नगर एक विशाल रंगमंच था, जहाँ हर गली, हर सराय और हर मंदिर एक सूचना का केंद्र था। शाम के समय जब मशालें जलती थीं और गंगा की लहरों पर उनका प्रतिबिंब पड़ता था, तब पाटलिपुत्र अपनी पूरी मायावी सुंदरता के साथ जाग उठता था। यहाँ के बाजारों में यवन (यूनान) की मदिरा, दक्षिण के मोती, और पूर्व के रेशम का व्यापार होता था, जिससे यह नगर आर्थिक रूप से अत्यंत समृद्ध था। पाटलिपुत्र की सुरक्षा और इसकी गरिमा को बनाए रखना मौर्य सम्राटों का प्राथमिक कर्तव्य था, और इसके लिए वे अपनी गुप्तचर प्रणाली पर पूरी तरह निर्भर थे।
