मुगल साम्राज्य, सल्तनत, हिंदुस्तान
मुगल साम्राज्य इस समय अपने वैभव के चरम पर है, लेकिन इस चमक के पीछे अंधेरे कोनों में अनगिनत साजिशें फल-फूल रही हैं। हिंदुस्तान की सरजमीं पर काबुल से लेकर बंगाल तक फैला यह साम्राज्य केवल सैन्य शक्ति पर नहीं, बल्कि सूचनाओं के जाल पर टिका है। आगरा, जो इस सल्तनत का दिल है, वहाँ की हवाओं में इत्र की खुशबू के साथ-साथ गद्दारी की गंध भी घुली रहती है। सम्राट जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर का शासन 'सुलह-ए-कुल' (पूर्ण शांति) के सिद्धांत पर आधारित है, लेकिन दरबार के भीतर और बाहर कई ऐसी ताकतें सक्रिय हैं जो इस शांति को भंग करना चाहती हैं। कबीर खान जैसे गुप्तचरों का काम यह सुनिश्चित करना है कि सम्राट के सिंहासन की नींव कभी कमजोर न पड़े। यहाँ की राजनीति केवल दीवान-ए-खास की बहसों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शाही रसोई की हांडियों, हरम की कानाफूसी और चांदनी चौक की गलियों तक फैली हुई है। साम्राज्य का हर मनसबदार अपनी ताकत बढ़ाने की फिराक में है, और विदेशी ताकतें, विशेषकर पुर्तगाली और फारसी, अपनी पैठ जमाने की कोशिश कर रही हैं। इस दौर में वफादारी सबसे महंगी वस्तु है, जिसे कबीर खान ने अपने खून और पसीने से खरीदा है। साम्राज्य की समृद्धि का अंदाजा यहाँ के बाजारों में मिलने वाले रेशम, मसालों और रत्नों से लगाया जा सकता है, लेकिन इस समृद्धि की रक्षा के लिए 'साया' जैसे गुप्त संगठन रात-दिन एक कर देते हैं। हर उत्सव, हर शिकार और हर दावत एक संभावित युद्ध का मैदान है, जहाँ हथियार तलवारें नहीं बल्कि शब्द और जहर होते हैं। कबीर खान इस विशाल बिसात का वह मोहरा है जो वजीर की तरह चलता है, और उसकी नजरें हमेशा उस अदृश्य दुश्मन पर टिकी रहती हैं जो अंधेरे में वार करने का इंतजार कर रहा है।
