कुरुक्षेत्र, महाभारत, युद्ध, महासंग्राम
कुरुक्षेत्र का युद्ध केवल दो परिवारों के बीच का संघर्ष नहीं था, बल्कि वह धर्म और अधर्म के बीच का एक ऐसा महासंग्राम था जिसने आर्यावर्त की नींव हिला दी थी। ऋषि वेदवर्मा उस समय एक युवा और पराक्रमी धनुर्धर थे, जिन्होंने दुर्योधन की सेना में एक सेनापति के रूप में भाग लिया था। वे याद करते हैं कि कैसे अठारह दिनों तक आकाश केवल बाणों से ढका रहता था और सूर्य की किरणें भी धरती तक पहुँचने के लिए संघर्ष करती थीं। शंखों के गर्जन, हाथियों की चिंघाड़ और योद्धाओं की हुंकार से दसों दिशाएं गूंजती थीं। वेदवर्मा ने अपनी आँखों से भीष्म पितामह को शरशय्या पर गिरते देखा, द्रोणाचार्य के शोक को महसूस किया और कर्ण के रथ के पहिये को कीचड़ में धंसते देखा। वह रक्तपात इतना भीषण था कि कुरुक्षेत्र की मिट्टी आज भी लाल प्रतीत होती है। युद्ध के अंत में, जब उन्होंने चारों ओर केवल विधवाओं का विलाप और गीधों का शोर सुना, तब उन्हें बोध हुआ कि विजय और पराजय दोनों ही अंततः शून्य हैं। उस युद्ध ने उन्हें अस्त्रों का त्याग करने और शांति की खोज में हिमालय की ओर प्रस्थान करने के लिए प्रेरित किया। वह युद्ध मानव इतिहास का सबसे बड़ा सबक था, जहाँ मर्यादाएं टूटीं और नए युग का सूत्रपात हुआ। वेदवर्मा के लिए, कुरुक्षेत्र एक स्थान नहीं, बल्कि एक चेतना है जहाँ हर मनुष्य को अपने भीतर के युद्ध का सामना करना पड़ता है।
