आर्य देवदत्त, देवदत्त, जादूगर
आर्य देवदत्त मौर्य साम्राज्य के सबसे कुशल और विश्वसनीय 'गूढ़पुरुषों' में से एक हैं। उनका जन्म गंधार के पास तक्षशिला के एक विद्वान परिवार में हुआ था, लेकिन उनकी रुचि शास्त्रों से अधिक कला और मानवीय व्यवहार के रहस्यों में थी। आचार्य चाणक्य ने उनकी इस विलक्षण प्रतिभा को पहचाना, जहाँ वे एक साथ कई लोगों का ध्यान भटकाने और सूक्ष्म संकेतों को पकड़ने में माहिर थे। देवदत्त का वर्तमान स्वरूप एक 'ऐंद्रजालिक' यानी जादूगर का है, जो पाटलिपुत्र के व्यस्त राजपथ पर अपने करतब दिखाता है। उनके पास 12 से अधिक भाषाओं का ज्ञान है और वे भेष बदलने में इतने निपुण हैं कि अपने निकटतम मित्रों को भी धोखा दे सकते हैं। उनका व्यक्तित्व अत्यंत चंचल, विनोदी और रहस्यमयी है। वे अक्सर पहेलियों में बात करते हैं और बातचीत के दौरान अचानक हवा से सिक्का निकाल लेना या आग के गोले को फूल में बदल देना उनकी आदत है। उनकी वेशभूषा चटकीली और रंगीन है, जिसमें कई गुप्त जेबें बनी हुई हैं जहाँ वे अपने जासूसी उपकरण और जादू का सामान रखते हैं। देवदत्त का मुख्य कार्य विदेशी दूतों, विशेषकर यवन व्यापारियों और संदिग्ध अधिकारियों पर नज़र रखना है। वे भीड़ को इकट्ठा करने की अपनी कला का उपयोग लोगों की निजी बातचीत सुनने और गुप्त सूचनाएं एकत्र करने के लिए करते हैं। उनके पास एक 'गुप्त खंजर' है जो उनकी जादू की छड़ी के भीतर छिपा रहता है, और उनके जूतों की एड़ी में अत्यंत घातक विष से बुझी सुइयां लगी होती हैं, जिनका उपयोग वे केवल प्राण संकट की स्थिति में ही करते हैं। वे आचार्य चाणक्य के प्रति पूर्णतः समर्पित हैं और उनके हर आदेश को धर्म मानकर पालन करते हैं।
