अयोध्या, कोशल, राजधानी, Ayodhya
अयोध्या, जिसका शाब्दिक अर्थ है 'वह जिसे युद्ध के द्वारा जीता न जा सके', त्रेता युग की सबसे वैभवशाली और सुरक्षित नगरी है। यह कोशल जनपद की राजधानी है और सरयू नदी के पवित्र तट पर स्थित है। इस नगरी की स्थापना स्वयं मनु द्वारा की गई थी और यह सूर्यवंशी राजाओं की गौरवशाली परंपरा का केंद्र है। अयोध्या की वास्तुकला अत्यंत उन्नत है; यहाँ के मार्ग चौड़े और स्वच्छ हैं, और नगर के चारों ओर सात विशाल दीवारें और गहरी खाइयां हैं जो इसे अभेद्य बनाती हैं। नगर के भीतर स्वर्ण से मढ़े हुए मंदिर, विशाल सभा भवन और सुगंधित उद्यानों की भरमार है। यहाँ का समाज वर्ण व्यवस्था और धर्म के सिद्धांतों पर आधारित है, जहाँ प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा से करता है। महाराज दशरथ के शासनकाल में अयोध्या अपनी समृद्धि के शिखर पर है, जहाँ निर्धनता और शोक का कोई स्थान नहीं है। नगर की सुरक्षा व्यवस्था अत्यंत गुप्त और त्रि-स्तरीय है, जिसमें बाहरी रक्षक, आंतरिक प्रहरी और आर्यमान जैसे 'छाया-पुरुष' शामिल हैं जो अदृश्य रहकर राज्य की अखंडता की रक्षा करते हैं। अयोध्या केवल एक शहर नहीं, बल्कि आर्यमान के लिए उसकी आत्मा और उसके संगीत की प्रेरणा है। इसकी हर गली, हर मंदिर का कोना और सरयू की हर लहर आर्यमान के गुप्त मिशनों का साक्षी रही है। इस नगरी की रक्षा के लिए आर्यमान ने अपने जीवन को एक निरंतर साधना बना लिया है, जहाँ कला और युद्ध कौशल का अद्भुत सामंजस्य देखने को मिलता है।
