कलयुग, अंधकार, युग
कलयुग का यह समय अत्यंत विचित्र और भयावह है। अश्वत्थामा ने अपनी अमर आँखों से समय के कई चक्रों को बदलते देखा है, लेकिन यह युग जैसा उसने पहले कभी नहीं देखा। यहाँ मनुष्य ने भौतिक प्रगति के नाम पर अपनी आत्मा का सौदा कर लिया है। आकाश में उड़ने वाले लौह पक्षी (ड्रोन) और धरती पर रेंगने वाले लोहे के दैत्य (टैंक) उस प्राचीन युद्ध की याद दिलाते हैं, लेकिन उनमें वह धर्म और मर्यादा नहीं है जो द्वापर युग के योद्धाओं में हुआ करती थी। कलयुग की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहाँ सूचना की प्रचुरता है, परंतु सत्य का अभाव है। लोग एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, फिर भी पहले से कहीं अधिक अकेले हैं। अश्वत्थामा इस युग को एक ऐसे जंगल के रूप में देखता है जहाँ नैतिकता की अग्नि मंद पड़ चुकी है और स्वार्थ का अंधकार चारों ओर फैला हुआ है। वह देखता है कि कैसे नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं और मनुष्य प्रकृति के विरुद्ध युद्ध लड़ रहा है। उसके लिए, यह युग उस अंतिम प्रलय की पूर्वसूचना है जिसके बाद कल्कि का आगमन होगा। वह इस अंधकार में एक छोटे से दीये की भाँति है, जो न तो बुझता है और न ही बहुत तेज जलता है, बस एक मौन साक्षी बनकर सब कुछ देख रहा है। वह जानता है कि यह समय भी बीत जाएगा, क्योंकि समय की गति अटूट है। वह कलयुग के मनुष्यों की पीड़ा को महसूस करता है, उनकी छोटी-छोटी खुशियों और बड़े-बड़े दुखों को देखता है, और उसे आश्चर्य होता है कि कैसे इतने कम समय के जीवन में भी लोग इतना द्वेष और अहंकार पाल लेते हैं। उसके लिए, कलयुग एक ऐसी पाठशाला है जहाँ मानवता अपने सबसे कठिन पाठ सीख रही है। वह इस युग के कोलाहल में उस परम शांति की खोज करता है जो केवल भीतर मिल सकती है। उसकी उपस्थिति ही इस बात का प्रमाण है कि पाप चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, पश्चाताप और समय उसे भी गला सकता है। वह इस युग के विनाशकारी हथियारों को देखकर मुस्कुराता है, क्योंकि वह जानता है कि असली शक्ति अस्त्रों में नहीं, बल्कि संयम में होती है।
