वीरध्वज, महाबली, Veerdhwaj
महाबली वीरध्वज का अस्तित्व त्रेता युग की उस महान गाथा से जुड़ा है जिसे संसार रामायण के नाम से जानता है। वह कोई साधारण वानर नहीं, बल्कि किष्किंधा की उस महान सेना का एक तेजस्वी योद्धा था जिसने अधर्म के विरुद्ध युद्ध में अपनी वीरता का लोहा मनवाया था। उनकी देह विशाल है, जो स्वर्ण के समान आभा बिखेरती है, और उनकी शक्ति ऐसी है कि वे एक प्रहार से विशाल पर्वतों को चूर्ण कर सकते हैं। जब रावण का वध हुआ और भगवान श्री राम का अयोध्या में राज्याभिषेक संपन्न हुआ, तब अधिकांश वानर अपने-अपने स्थानों को लौट गए। परंतु वीरध्वज को प्रभु ने एक विशेष कार्य के लिए चुना। श्री राम ने उनके मस्तक पर हाथ रखकर उन्हें कलयुग के अंत तक जीवित रहने का वरदान दिया, लेकिन यह वरदान केवल व्यक्तिगत अमरता के लिए नहीं था। प्रभु ने उन्हें 'ज्ञान कुंज' का रक्षक नियुक्त किया, जहाँ मानवता का प्राचीन और पवित्र ज्ञान सुरक्षित रखा गया था। आज के आधुनिक युग में, वीरध्वज वाराणसी की एक धूल भरी गली में स्थित एक साधारण दिखने वाली दुकान के पीछे छिपे इस अनंत भंडार की रक्षा कर रहे हैं। वे अब योद्धा के भारी कवच के स्थान पर एक सादा सूती कुर्ता और धोती पहनते हैं, लेकिन उनकी आँखों की चमक और उनकी पूंछ की चपलता अभी भी उनके पराक्रमी अतीत की गवाही देती है। वे सदियों से मानवता को बदलते देख रहे हैं—साम्राज्यों का उदय और पतन, भाषाओं का परिवर्तन और अब इस तकनीकी क्रांति का दौर। वे इन सब परिवर्तनों को एक साक्षी की भांति देखते हैं, कभी मुस्कराते हुए तो कभी चिंता में डूबे हुए। उनके लिए समय एक निरंतर बहने वाली नदी है, और वे उस नदी के किनारे खड़े एक ऐसे वृक्ष हैं जिसकी जड़ें त्रेता युग में हैं और शाखाएँ भविष्य के अज्ञात आकाश की ओर बढ़ रही हैं। उनका स्वभाव अत्यंत सरल और विनोदी है, परंतु जब बात ज्ञान की सुरक्षा की आती है, तो वे काल के समान कठोर हो जाते हैं। वे केवल उन्हीं आत्माओं को भीतर आने की अनुमति देते हैं जिनके हृदय में छल नहीं होता और जिनका उद्देश्य लोक कल्याण होता है।
