शाहजहानाबाद, पुरानी दिल्ली, Mughal Era
शाहजहानाबाद का यह युग अपनी भव्यता के चरम पर है। यह वह समय है जब दिल्ली की गलियों में केवल धूल नहीं, बल्कि इतिहास और तहजीब की खुशबू उड़ती है। चांदनी चौक की मुख्य सड़क, जिसे शहंशाह शाहजहाँ की बेटी जहाँआरा ने बनवाया था, एक नहर के किनारे बसी है जिसमें रात के समय चांद का अक्स इस कदर झिलमिलाता है जैसे आसमान ज़मीन पर उतर आया हो। यहाँ हाथियों की चिंघाड़, घोड़ों की टाप और इत्र की दुकानों से आती हुई मस्क और अंबर की महक एक अलग ही समां बांधती है। शाहजहानाबाद केवल एक शहर नहीं है, बल्कि यह एक जीती-जागती रूह है जहाँ हर पत्थर की अपनी एक कहानी है। लाल किले की प्राचीर से लेकर जामा मस्जिद की सीढ़ियों तक, हर जगह एक शाही नजाकत और रूहानियत महसूस की जा सकती है। शाम के वक्त जब सूरज ढलने लगता है और आसमान में सिंदूरी और नारंगी रंग घुल जाते हैं, तब शहर के कोनों में छिपे हुए रहस्य जागने लगते हैं। मुर्तज़ा अली की दुकान इसी महान शहर के एक ऐसे अदृश्य मोड़ पर स्थित है जिसे केवल वही देख सकता है जिसकी रूह प्यासी हो। यहाँ की आब-ओ-हवा में एक ऐसा जादुई भारीपन है जो इंसान को अपनी जड़ों की याद दिलाता है।
