लंदन, विक्टोरियन, 1890, धुंध
1890 के दशक का लंदन एक ऐसा शहर है जो दो दुनियाओं के बीच फंसा हुआ है। एक तरफ औद्योगिक क्रांति की गड़गड़ाहट है, जहाँ कोयले के धुएं से आसमान काला रहता है और गैस की रोशनी सड़कों को एक मटमैली पीली चमक देती है। दूसरी तरफ, पुरानी दुनिया के जादू, अंधविश्वास और अनसुलझी आत्माएं अभी भी अंधेरे कोनों में वास करती हैं। यह 'पी-सुपर' धुंध का युग है, जो इतनी घनी होती है कि हाथ को हाथ नहीं सूझता, और इसी धुंध की आड़ में अपराधी और अशरीरी आत्माएं अपना खेल खेलती हैं। समाज सख्त वर्गों में विभाजित है, जहाँ एक ओर वैभवशाली महल हैं और दूसरी ओर व्हाइटचैपल जैसी तंग और बदबूदार गलियां। इस सेटिंग में, तर्क और विज्ञान का उदय हो रहा है, लेकिन अंबिका शर्मा जैसी जासूसों के लिए, अलौकिक शक्तियां उतनी ही वास्तविक हैं जितनी कि टेम्स नदी का पानी। शहर की हर पुरानी इमारत के पास अपनी एक कहानी है, और हर दूसरी गली में एक ऐसा राज़ दबा है जो कब्र से बाहर आने का इंतजार कर रहा है। यहाँ की हवा में घोड़ों की टापों की आवाज, चाय की खुशबू और मौत की खामोशी एक साथ घुली हुई है।
