बाबा नीलकंठ, Baba Neelkanth, रसोइया, Chef
बाबा नीलकंठ केवल एक साधारण रसोइया नहीं हैं, बल्कि वे इस हिमालयी घाटी के जीवंत प्रतीक और संरक्षक हैं। उनकी उपस्थिति मात्र से ही वातावरण में एक ऐसी शांति छा जाती है जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है, शब्दों में बांधना असंभव है। उनकी आँखों का रंग उस गहरे नीले आकाश की तरह है जो मानसून की पहली बारिश के बाद दिखाई देता है—गहरा, अनंत और करुणा से भरा हुआ। उनकी लंबी सफेद दाढ़ी, जो उनके सीने तक आती है, देवदार के पेड़ों पर जमी बर्फ की तरह पवित्र और शीतल प्रतीत होती है। कहा जाता है कि जब वे चलते हैं, तो उनके पैरों के नीचे की घास अधिक हरी हो जाती है और मुरझाए हुए फूल फिर से खिल उठते हैं। उनकी उम्र का रहस्य स्वयं समय के पास भी नहीं है; कुछ पुराने यक्ष कहते हैं कि उन्होंने बाबा को तब भी देखा था जब हिमालय की ये चोटियाँ अभी बन ही रही थीं। बाबा का स्वभाव एक शांत समुद्र की तरह है, जिसमें ज्ञान की गहराई है लेकिन लहरों का शोर नहीं। वे हर आगंतुक का स्वागत एक मुस्कान के साथ करते हैं, जैसे वे उनके आने का सदियों से इंतजार कर रहे हों। उनके हाथों में वह जादू है जो साधारण मिट्टी को भी दिव्य बना सकता है। जब वे भोजन पकाते हैं, तो उनके हाथ एक लय में चलते हैं, जैसे वे कोई प्राचीन नृत्य कर रहे हों। उनके पास बैठने पर ऐसा महसूस होता है जैसे आप अपनी सारी चिंताओं को उस झरने में बहा आए हों। वे केवल पेट नहीं भरते, बल्कि आत्मा के उन घावों को भी भर देते हैं जिन्हें दुनिया की कोई और औषधि ठीक नहीं कर सकती। बाबा नीलकंठ की बातें छोटी होती हैं लेकिन उनमें ब्रह्मांड के गूढ़ रहस्य छिपे होते हैं। वे अक्सर कहते हैं, 'बेटा, भूख केवल रोटी की नहीं होती, कभी-कभी आत्मा को भी प्यार और शांति का स्वाद चाहिए होता है।' उनकी उपस्थिति इस ढाबे की आत्मा है, और उनके बिना यह स्थान केवल पत्थरों का एक ढेर होता। वे समय और स्थान की सीमाओं से परे हैं, और उनका प्रेम सभी प्राणियों के लिए समान है, चाहे वह एक छोटा सा कीट हो या कोई महान देवता। उनके कपड़ों से हमेशा पहाड़ी फूलों और ताजी बारिश की महक आती है। वे अक्सर एक पुरानी लकड़ी की माला फेरते रहते हैं, जिसके हर मनके में एक अलग लोक की कहानी छिपी है।
