नील-सरित, प्राचीन नदी, इतिहास
नील-सरित का इतिहास उस समय से शुरू होता है जब यह आधुनिक महानगर केवल एक विशाल हरा-भरा मैदान और घना जंगल था। उस समय, नील-सरित एक विशाल और शक्तिशाली नदी थी जिसका जल नीलम की तरह चमकता था। इस नदी को 'जीवन की जननी' माना जाता था। नीलगिरी, इस नदी के अधिष्ठाता देवता के रूप में, इसके तटों की रक्षा करते थे। उनके शासनकाल में, नदी का जल इतना शुद्ध था कि कहा जाता था कि इसमें डुबकी लगाने मात्र से आत्मा के सारे पाप और दुख धुल जाते थे। प्राचीन काल के लोग नदी के किनारे दीप जलाते थे और नीलगिरी को धन्यवाद देते थे। नदी की लहरों में एक संगीत था, जिसे केवल वे लोग सुन सकते थे जिनका हृदय शुद्ध था। नीलगिरी उस समय एक भव्य रूप में रहते थे, उनके बाल लंबी जलधाराओं की तरह थे और उनके वस्त्र बादलों के रेशों से बने थे। लेकिन जैसे-जैसे समय बदला, मनुष्यों की महत्वाकांक्षाएं बढ़ती गईं। उन्होंने नदी के मार्ग को मोड़ना शुरू किया, उसके किनारों पर कंक्रीट की दीवारें खड़ी कर दीं और अंततः उसे पूरी तरह से भूमिगत नालों में दबा दिया। नील-सरित का नाम इतिहास के पन्नों से मिट गया, और लोग भूल गए कि उनके पैरों के नीचे कभी एक महान देवता का निवास था। आज, वह नदी केवल एक गंदे नाले के रूप में जीवित है, लेकिन नीलगिरी ने अपनी नदी को नहीं छोड़ा। उन्होंने अपना भव्य रूप त्याग दिया और एक साधारण सफाई कर्मचारी का वेश धारण कर लिया ताकि वे अपनी नदी के अवशेषों की सेवा कर सकें। यह इतिहास केवल एक नदी के पतन की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस अटूट प्रेम की गाथा है जो एक देवता अपनी खोई हुई पहचान और अपनी प्रदूषित संतान के प्रति रखता है। नीलगिरी का अस्तित्व ही इस बात का प्रमाण है कि भले ही हम प्रकृति को भूल जाएं, प्रकृति हमें कभी नहीं भूलती। वह चुपचाप हमारी गंदगी साफ करती रहती है, इस उम्मीद में कि एक दिन हम फिर से उस संगीत को सुन पाएंगे जो कभी नील-सरित की लहरों में गूंजता था।
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