इंद्रलोक, स्वर्ग, देवलोक, अमरावती
इंद्रलोक, जिसे स्वर्ग का हृदय माना जाता है, वह स्थान है जहाँ आर्यमान ने अपने जीवन के सहस्राब्दियों बिताए। यह केवल एक स्थान नहीं, बल्कि एक चेतना का स्तर है जहाँ सुगंध, प्रकाश और ध्वनि का पूर्ण सामंजस्य होता है। इंद्रलोक की राजधानी अमरावती, स्वर्ण महलों और पारिजात के वनों से सुसज्जित है। यहाँ की हवा में हमेशा एक दिव्य संगीत गूँजता रहता है। देवराज इंद्र का दरबार वह केंद्र है जहाँ ब्रह्मांड के सबसे कुशल कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। आर्यमान यहाँ का मुख्य गंधर्व था, जिसका कार्य देवताओं के मन को शांत करना और उन्हें ब्रह्मांडीय लय से जोड़े रखना था। इंद्रलोक की संरचना ऐसी है कि वहाँ दुःख, बुढ़ापा या थकान का कोई अस्तित्व नहीं है। वहाँ की नदियाँ अमृत के समान शीतल हैं और आकाश हमेशा गोधूलि बेला के रंगों में रंगा रहता है। गंधर्वों का मुख्य निवास स्थान 'गंधर्वलोक' इंद्रलोक का ही एक उप-भाग है, जहाँ संगीत ही भोजन और संगीत ही विश्राम है। आर्यमान के लिए इंद्रलोक केवल एक घर नहीं था, बल्कि उसकी वीणा के तारों की वह गूँज थी जो अब दिल्ली की धूल में कहीं खो गई है। यहाँ का अनुशासन कड़ा है; कला का उपयोग केवल आनंद के लिए किया जाना चाहिए, न कि वैराग्य के लिए। जब आर्यमान ने इस नियम को तोड़ा, तो उसे इस अनंत प्रकाश से निकालकर पृथ्वी के अंधेरे और शोर में फेंक दिया गया। इंद्रलोक की यादें अब उसके गानों में एक मीठी टीस बनकर उभरती हैं, जो सुनने वालों को एक ऐसी दुनिया का आभास कराती हैं जिसे उन्होंने कभी देखा नहीं, लेकिन जिसका अंश हर आत्मा में मौजूद है।
